लेख -बिजेंद्र पुंडीर (वरिष्ठ पत्रकार)
मसूरी : 2 सितंबर सन 1994 का दिन उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन के इतिहास का काला दिन है जब मसूरी में खटीमा कांड को लेकर मौन जुलूस पर पुलिस ने बर्बरता पूर्वक गोली चला दी व उसमें छह आंदोलनकारी हंसा थनाई, श्रीमती बेलमती चैहान, रायसिंह बंगारी, मदन मोहन मंगाई, बलवीर सिंह नेगी व धनपत सिंह शामिल हैं वहीं पुलिस के डीएसपी उमाकांत त्रिपाठी भी शहीद हो गये थे।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन में मातृशक्ति के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। शहीद स्थल पर पुलिस ने आंदोलनकारी महिला हंसा धनाई व बेलमती चैहान के सिर पर गोली मारी जिन्होंने मौके पर ही दम तोड़ दिया। उत्तराखंड राज्य निर्माण को लेकर राज्य आंदोलनकारियों में आक्रोश व्याप्त हो गया था।
इस संबंध में शहीद बलवीर सिंह नेगी के भाई राजेंद्र सिंह नेगी बताते हैं कि 30 वर्ष की उम्र में बलवीर सिंह नेगी हमें छोड़कर चला गया जिससे कि पूरा परिवार बिखर गया और आज भी उसकी याद आते ही पूरा परिवार सदमे में आ जाता है। उन्होंने कहा कि जिस अवधारणा से उत्तराखंड राज्य बनाने की मांग की गई वह आज धरातल पर कहीं भी नहीं दिखाई देता। आज भी राज्य आंदोलनकारी चिन्हीकरण को लेकर मांग कर रहे हैं। उत्तराखंड राज्य बनने से केवल नेताओं और अधिकारियों का ही फायदा हुआ है आम जनमानस आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। साथ ही उन्होंने कहा कि इससे बेहतर स्थिति तो उत्तर प्रदेश के शासनकाल में थी। आंदोलन में अपनी जान गवाने वाली हंसा धनाई के पति भगवान सिंह धनाई कहते हैं कि उत्तराखंड राज्य निर्माण को लेकर आंदोलन चरम पर था और शहर शहर गांव गांव आंदोलन की अलग जगाने के लिए मातृशक्ति लगातार प्रयासरत थी आज उसी का नतीजा है कि राज्य आंदोलन में मातृशक्ति का सबसे बड़ा योगदान रहा है। उन्होंने कहा कि अभी भी राज्य के शहीदों के सपनों को साकार नहीं किया जा सका है।
वहीं पूर्व विधायक जोत सिंह गुनसोला कहते हैं कि राज्य आंदोलन के दौरान उन्होंने पुलिस की बर्बरता और यातनाएं सही कई बार जेल भी गए और जेल में भी पुलिस द्वारा अमानवीय व्यवहार किया गया उन्होंने बताया कि उत्तराखंड राज्य निर्माण में आम जनमानस की सहभागिता को नकारा नहीं जा सकता है आज उत्तराखंड के लोग खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। राज्य आंदोलनकारी प्रदीप भंडारी ने कहा कि 2 सितंबर का वो काला दिन कभी भुलाया नहीं जा सकता है कि किस प्रकार पुलिस ने बर्बरता पूर्वक महिलाओं के सर पर संगीन लगाकर गोली मार दी कई लोग जख्मी हुए कई लोग आज भी उस पीड़ा को याद कर सिहर जाते हैं पुलिस ने बर्बरता की सारी हदें पार कर दी थी। उत्तराखंड राज्य आंदोलन एक ऐसा आंदोलन रहा जिसमें उत्तर प्रदेश की तत्कालीन सरकार की बर्बरता इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई और आज भी उत्तराखंड के लोग बर्बरता की उस कहानी को भूल नहीं पाए हैं।
मसूरी के इतिहास में पहली बार 14 दिन का कफ्र्यू भी लगाया गया था। लेकिन सवाल उठता है कि राज्य बनने के 21 साल बाद व मसूरी गोलीकांड के 27 साल बाद भी राज्य के सपने, सपने बनकर रह गये। आज भी राज्य आंदोलनकारी चिन्हीकरण के लिए आंदोलनरत हैं। राज्य निर्माण के बाद जिस पलायन को रोकने की बात की गई थी आज वह दुगना हो गया, पहाड़ के गांव लगातार खाली हो रहे हैं व राज्य में बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है। अब तो लोग यह करने से नहीं कतराते कि उत्तर प्रदेश में ही ठीक था।
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