उत्तराखंड में होम स्टे योजना गढ़ रहा नया आयाम, सैलानियों को आ रहे खूब पसंद, पॉलिसी में हुआ बदलाव, देहरादून से धीरज सजवाण की रिपोर्ट
देहरादून: उत्तराखंड में होम स्टे योजना को अपने उद्देश्य से भटकते देख सरकार ने कई नियमों को बदल कर इसे रिफॉर्म किया है. इस बदलाव के साथ अब उत्तराखंड में होम स्टे योजना का स्वरूप क्या होगा और इसके नए नियम क्या हैं? आइए विस्तार से जानते हैं.
उत्तराखंड में मिल का पत्थर साबित हुई ‘होम स्टे योजना: उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को आजीविका मुहैया कराने और रोजगार के लिए बड़े शहरों या दूसरे राज्यों की तरफ पलायन ना करना पड़े. इस मकसद से उत्तराखंड सरकार होम स्टे योजना लाई. जिसके तहत गांवों में रोजगार और हॉस्पिटिलिटी को एक नई दिशा दी गई.
साल 2015 से धरातल पर उतारी गई होम स्टे योजना की सफलता का अंदाजा, इसी बात से लगाया जा सकता है कि हरीश रावत सरकार के इस मॉडल को त्रिवेंद्र सरकार और फिर धामी सरकार ने भी अपनाया. जिसके बाद लगातार उत्तराखंड ने होम स्टे योजना को लेकर कई कीर्तिमान स्थापित किए. जिससे न केवल ग्रामीणों को रोजगार मिला. बल्कि, स्थानीय उत्पाद भी बिके.
समय-समय पर जरूरत के हिसाब से हुआ संशोधन: साल 2015 में होम स्टे योजना शुरू हुई. जिसके तहत पहले रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया शुरू की गई. जबकि, साल 2018 में सब्सिडी स्कीम के तहत पहले से चल रही ‘वीर चंद्र सिंह गढ़वाली पर्यटन स्वरोजगार योजना’ को ‘पंडित दीन दयाल उपाध्याय गृह आवास (होम स्टे) विकास योजना (उत्तराखंड) से जोड़ा गया.
इसमें ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देते के लिए सरकार ने कई खास कदम उठाए. जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों में विकसित हो रहे होम स्टे को लाभ पहुंचाने और उन्हें प्रोत्साहित करने मकसद के कई काम किए. जिसके तहत बिजली-पानी के बिल के व्यावसायिक दर में छूट प्रदान की गई. साथ ही अन्य कई तरह से राहत दी गई. जिससे होम स्टे योजना को संबल मिला.
“उत्तराखंड में 5 हजार से ज्यादा होमस्टे रजिस्टर्ड हैं. जब से यह योजना शुरू हुई है, तब से करीब 1,500 लोगों को इस होम स्टे योजना के तहत सब्सिडी दी गई है. इसके अलावा ट्रेकिंग एंड अट्रैक्शन योजना के तहत रूम को रिनोवेट कर सकते हैं. जिसके तहत भी कई गावों में स्थानीय लोगों के रूम को रिनोवेट किया गया है.“- धीराज गर्ब्याल, पर्यटन सचिव
उत्तराखंड में यह योजना लगातार परवान चढ़ती गई और होमस्टे के प्रति लोगों के रुझान बढ़ता गया. यही वजह है कि आज होम स्टे योजना के तहत प्रदेशभर में 5 हजार से ज्यादा होमस्टे पंजीकृत हैं, लेकिन इस योजना का गलत फायदा भी उठाया गया. जिसके चलते समय-समय पर इसमें संशोधन कर सुधार भी किए गए. कुछ लोगों ने इस योजना का जमकर दुरुपयोग भी किया. जिस पर कई होम स्टे सील भी किए गए, तो कई जगहों पर कार्रवाई भी हुई.
इस बार ‘होम स्टे’ पॉलिसी में हुए ये बदलाव-
इस तरह से ट्रैवल एवं रजिस्ट्रेशन और होम स्टे से जुड़े नियमावली का भी एकीकरण किया गया है. इसके अलावा रिन्यूअल प्रक्रिया को आसान कर दिया गया है. जिसके चलते लोगों को भटकना नहीं पड़ेगा. आसानी से सेल्फ रिन्यूअल कर अपने काम कर सकते हैं.
“उत्तराखंड में ट्रैवल एवं रजिस्ट्रेशन के लिए साल 2014 में एक नियमावली बनाई गई थी. जबकि, होम स्टे के लिए साल 2015 में नियमावली बनी थी. इन दोनों एक साथ मिलाकर एक नई नियमावली बनाई गई है. जिसमें सभी चीजों का समावेश किया गया है.”
“रिन्यूअल प्रक्रिया को भी आसान बनाया गया है. पहले हर पांच में रिन्यूअल करनावा पड़ता था. जिसमें सारी प्रक्रियाएं पूरी कर सरकार से अनुमति लेनी पड़ती थी, लेकिन अब सारी प्रक्रियाएं कर उसकी जो भी फीस होगी, उसे भर कर सेल्फ रिन्यूअल कर शासन को बताना होगा.“- धीराज गर्ब्याल, पर्यटन सचिव
सामुदायिक पर्यटन इकाई के तहत पूरा गांव बना सकता है नई पहचान: उत्तराखंड पर्यटन अपर निदेशक पूनम चंद ने बताया कि इस बार होम स्टे नीति में सामुदायिक आधारित पर्यटन इकाई को एक नए कॉन्सेप्ट के रूप में शामिल किया गया है. इस पहल का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत स्तर पर होम स्टे संचालन तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे क्षेत्र को पर्यटन से जोड़ते हुए गांवों को एक साझा पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करना है.
“संशोधित नियमावली के तहत ऐसे समूह बनाए जाएंगे, जिनमें कम से कम 8 से 10 होम स्टे इकाइयां शामिल होंगी. यह इकाइयां किसी एक पर्यटन स्थल, एक गांव या 3 से 6 गांवों के समूह में संचालित हो सकेंगी. इसका उद्देश्य स्थानीय समुदाय की भागीदारी बढ़ाकर ग्रामीण क्षेत्रों में पर्यटन गतिविधियों को संगठित रूप से विकसित करना है.“- पूनम चंद, अपर निदेशक, उत्तराखंड पर्यटन विभाग
“इस व्यवस्था के माध्यम से अब पूरा का पूरा गांव पर्यटन से सीधे जुड़ सकेगा. गांव के लोग मिलकर अपने क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता, स्थानीय संस्कृति, पारंपरिक खानपान, रीति-रिवाज और लोक जीवन को पर्यटकों के सामने पेश कर सकेंगे. इससे किसी एक घर या परिवार तक सीमित लाभ न रहकर पूरे गांव की आजीविका मजबूत होगी. स्थानीय लोगों के लिए नए रोजगार के अवसर भी सृजित होंगे.“- पूनम चंद, अपर निदेशक, उत्तराखंड पर्यटन विभाग
उन्होंने कहा कि यह नई व्यवस्था गांवों को पर्यटन के नक्शे पर नई पहचान दिलाने में मदद करेगी. अब एक पूरा गांव सामुदायिक रूप से विकसित होकर खुद को एक नए पर्यटन गंतव्य के रूप में स्थापित कर सकेगा. इससे गांव आधारित पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और ऐसे क्षेत्र, जो अब तक मुख्यधारा के पर्यटन से दूर थे, वे भी अपनी विशिष्ट पहचान बना पाएंगे.
“यह पहल राज्य में पर्यटन को नए आयाम देने के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है. इस योजना के तहत संबंधित संगठन का विधिक रूप से पंजीकृत होना अनिवार्य होगा. इसके लिए संस्था का पंजीकृत सोसाइटी, सहकारी समिति अथवा सामुदायिक संगठन के रूप में मान्यता प्राप्त होना आवश्यक है.“- पूनम चंद, अपर निदेशक, उत्तराखंड पर्यटन विभाग
पर्यटन अपर निदेशक पूनम चंद ने बताया कि इच्छुक समूहों से उत्तराखंड पर्यटन विकास बोर्ड (UTDB) समय-समय पर आवेदन आमंत्रित करेगा. साथ ही समूह स्तर पर होम स्टे निर्माण, मरम्मत और आवश्यक सुविधाओं के विकास के लिए अनुदान दिए जाने का भी प्रस्ताव है.
विभाग का मानना है कि सामुदायिक मॉडल के जरिए पर्यटन विकास को गांव-गांव तक पहुंचाया जा सकेगा. इस नई पहल को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश तैयार किए जा रहे हैं. ताकि, आने वाले समय में राज्य के कई गांव सामुदायिक पर्यटन के सफल उदाहरण बन सकें.
होम स्टे पॉलिसी में संशोधन के बाद संचालकों में उत्साह: लैंसडाउन क्षेत्र के पाली तल्ली में होम स्टे संचालक सूर्यकांत बड़थ्वाल ने होम स्टे पॉलिसी में संशोधन पर खुशी जताई है. उन्होंने बताया कि वो खुद ‘पंडित दीन दयाल उपाध्याय गृह आवास (होम स्टे) विकास योजना के तहत होम स्टे चला रहे हैं. इस योजना का लाभ युवाओं को मिल रहा है. यह योजना कई युवाओं को वापस अपने गांव लौटा चुका है. वो अब अपना स्वरोजगार कर अपनी आमदनी बढ़ा रहे है.
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