मसूरी – दृढ इच्छाशक्ति व हुनर के आगे दिव्यांगता आड़े नहीं आ सकती – दीपा मलिक

मसूरी : हिमालयन कार रैली में प्रतिभाग कर रही पैरा ओलंपिक में पहली भारतीय महिला मेडल विजेता दीपा मलिक ने कहा कि मुझे लोग खेलों के माध्यम से जानते है लेकिन मेरा मुख्य शौक वाहन चलाना रहा है। वर्तमान में पेरा ओलंपिंक समिति की अध्यक्ष भी हूं। उन्होंने कहा कि मै एक दिव्याग महिला हूं लेकिन मेरे सपनों की उडान के पंख मेंरी दिव्यांगता काट नहीं सकती।

 

दीपा मलिक ने कहा कि मेरे पास जो दो पहिए ईश्वर ने व्हील चेयर के रूप में दिए हैं, वह मेरी अपनी पंसद है है क्यो कि मुझे मोटर स्पोर्टस, बाइक चलानी है और शौक से चलाई। उन्होंने कहा कि मोटर स्पोर्टस रैली में प्रतिभाग करने वाली पहली महिला रही हूं, हिमालयन कार रैली सहित कई रैलियों में प्रतिभाग किया कई विश्व रिकार्ड बनाये वाहन चलाकर, और इस बार फिर हिमालयन कार रैली में प्रतिभाग कर रही हू। मेरे सपनों को उड़ान देने में राजन स्याल ने बहुत सहयोग किया। क्यों कि उन्होंने कहा कि अगर एक महिला गाडी चलाना चाहती है तो उसे  आजाद भारत में अवसर मिलना चाहिए व उनकी दिव्यांगता आड़े नहीं आना चाहिए। महिलाओं को उनका हक मिलना चाहिए। वर्तमान में महिला मोटर स्पोर्टस की सदस्य हूं महिला सशक्तिकरण की ओर देश बढ़ रहा है और ये नये भारत का स्वरूप है और इस समय भारत 75 वां आजादी का अमृत महोत्स मना रहा है और प्रधानमंत्री मोदी का सपना भी है कि महिलाओं को हर क्षेत्र में बराबरी का अवसर मिलना चाहिए दिव्यांगता आड़े नहीं आनी चाहिए और मै उसका प्रतिबिंब बनकर यहां मौजूद हूं और इस रैली में प्रतिभाग कर खुश हूं। उन्होंने कहा कि रैली का रूट बहुत अच्छा है पहली बार नये रूट पर चली हूं। मसूरी में कई बार आ चुकी हूं, यह देवभूमि है यहां आकर अच्छा लगता है वैसे लबासना में कई बार नये प्रशासनिक अधिकारियों को संबोधन देने आ चुकी हूं।

दीपा मलिक ने बताया कि वर्ष 2012 में अर्जुन अवार्ड मिला, वर्ष 2016 रियो ओलंपिक में रजत पदक जीत पहली भारतीय महिला बनी, 2018 में तीसरी बार एशियन रिकार्ड बनाकर पदक जीता व 2019 में 49 वर्ष की आयु में मुझे मेजर ध्यान चंद खेल रत्न मिला जो भारत का सबसे बड़ा खेल पुरूस्कार है। उन्होंने कहा कि महिला होना, दिव्याग होना व उम्र बढ़ना किसी भी लक्ष्य को हासिल करने में बाधा नहीं बन सकती अपुति उन्हें अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए दृढ इच्छाशक्ति व कड़ी मेहनत करनी चाहिए। उन्होंने दिव्यांगों को संदेश दिया कि मन के हारे हार है मन के जीते जीत। अगर मै 52 वर्ष की आयु में हिमालय पर गाड़ी चला सकती हूूं, विश्व रिकार्ड बना सकती हूं, देश के लिए 23 मेडल जीत सकती हूं तो यह सभी के लिए प्रेरणा है। दिव्यांग अपने अंदर हुनर पैदा करें अपनी मजबूत इच्छाशक्ति रखें व कुछ करने का संकल्प लें तो रास्ता अपने आप बनने लगेगा। मैनें भी हुनर सीखा गाड़ी चलाना सीखा व आज महिला सशक्ति करण दिव्यांग सशक्तिकरण को सार्थक करने का प्रयास कर रही हं। उम्मीद जगा रही हूं।

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