कैबिनेट मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत ने कामरेड वीरेंद्र भंडारी को दी श्रद्धाजलि, कहा कुछ ऐसा।

मसूरी : उत्तराखंड पर्यटन एवं तीर्थाटन संरक्षण समिति के तत्वाधान में कामरेड वीरेंद्र भंडारी श्रद्धांजलि तथा पर्यटन तीर्थाटन, स्वरोजगार गोष्ठी में बोलते हुए बतौर मुख्य अतिथि प्रदेश के वन मंत्री डा. हरक सिंह रावत ने कामरेड वीरेंद्र भंडारी को श्रद्धाजलि देते हुए कहा कि उन्होंने पूरा जीवन मजदूरों के हितों की रक्षा में लगाा दिया। इस मौके पर कामरेड वीरेंद्र भंडारी की पत्नी सरस्वती भंडारी को शॉल स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।


नगर पालिका सभागार में आयोजित कामरेड वीरेंद्र भंडारी श्रद्धांजलि एवं गोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि कबीना मंत्री डा. हरक सिंह रावत ने कहा कि कामरेड वीरेंद्र भंडारी ने हमेशा श्रमिक हितों के लिए संघर्ष किया। वहीं उन्होंने कहा कि जहां तक पर्यटन की बात है तो उत्तर प्रदेश से लेकर उत्तराखंड बनने के बाद तक एक भी पर्यटक स्थल विकसित नहीं किया गया जो दुर्भाग्य पूर्ण है। मसूरी, नैनीताल हो या अन्य सभी ब्रिटिश काल की देन हैं। उन्होंने कहा कि स्वरोजगार के लिए कौशल विभाग के माध्यम से यहां अभियान चलाया जायेगा। उन्होंने भिलाडू स्टेडियम के रास्ते पर कहा कि इसके लिए डीएफओ को हल निकालने के लिए कहा ताकि रास्ता बन जाये। सिफन कोर्ट के बारे में उन्होंने कहा कि इस संबंध में मुख्यमंत्री से वार्ता की जा रही है उनकी समस्या का शीघ्र समाधान होगा। उन्होंने कहा कि अतिशीघ्र मसूरी में वनभूमि का सर्वे पूरा कर दिया जाएगा ताकि मसूरी वासियों को वन टाईम सेटलमेंट योजना का लाभ तत्काल मिल सकें। उन्होंने कहा कि सम्पूर्ण मसूरी के विधुत लाइनों को अंडरग्राउंड किया जाएगा। उन्होंने ऊर्जा निगम के अधिकारियों को आदेश दिया कि तत्काल इस्टीमेट बनाकर उपलब्ध कराए।


इससे पूर्व ‘उत्तराखण्ड में पर्यटन, तीर्थाटन, पलायन, स्वरोजगार एवं वन कानून’ विषय पर गोष्ठी में वक्ताओं ने अपने विचार रखे  वक्ताओं ने प्रदेश में नए पर्यटन स्थलों व ईको टूरिज्म के विकास के लिए पर्वतीय राज्यों के अनुकूल वन नीति बनाने के लिए वन अधिनियम 1980 में आवश्यक संशोधन करने की मॉग रखी। वक्ताओं ने कहा कि वन कानूनों को सरल किए बगैर उत्तराखण्ड में नए पर्यटन स्थलों अथवा ईको टूरिज्म को स्थापित करने की बात निरर्थक है। प्रदेश में पर्वतीय पर्यटन की बुनियादी नीति न होने से स्वरोजगार की अपार संभवानाओं पर्यटन उद्योग व्यवहारिक रूप से उभर नहीं पा रहा है। राज्य बने 21 वर्षों में एक भी नया पर्यटन स्थल विकसित नहीं हो पाया है। आज पर्यटन विभाग का वन विभाग में विलय होने से ही उत्तराखण्ड में नए पर्यटन स्थलों व ईको टूरिज्म को स्थापित किया जा सकता है। इस अवसर पर कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि मसूरी नगर पालिका अध्यक्ष अनुज गुप्ता ने कहा कि मसूरी के संतुलित विकास में भी वन कानून आड़े आ रहे हैं। कहीं पर कोई भी नया विकास कार्य प्रारम्भ करने पर वहॉ वन विभाग की अड़चन आ जाती है। जबकि पर्यटन एवं प्रकृति एक दूसरे के प्रायःवाची जैसे हैं । अव्यवहारिक वन कानूनों के कारण मसूरी में लोग अपनी ज़मीन में एक छोटा सा घर नहीं बना पा रहे हैं । वन टाईम सेटलमेंट का लाभ नहीं ले पा रहे हैं । वन कानून पहाड़ के अनुकूल न होने के कारण सुनियोजित विकास नहीं हो पा रहा है । ऐसे में उत्तराखण्ड में नया प्राकृतिक, धार्मिक व ईको टूरिज्म प्रारम्भ करने के लिए पहाड़ी प्रदेशों की व्यवहारिक दिक्कतों के हिसाब से पुनः समीक्षा की जानी चाहिए और वन कानूनों को पर्वतीय क्षेत्रों के हिसाब से अनुकूल बनाए जाना चाहिए । जिसके लिए वन अधिनियम 1980 में संशोधन के लिए राज्य सरकार को एक प्रस्ताव बनाकर केन्द्र सरकार को भेजा जाना चाहिए। गोष्ठी के मुख्य वक्ता पर्यटन व संस्कृति विशेषज्ञ प्रदीप भण्डारी ने कहा कि उत्तराखण्ड प्राकृतिक संसाधनों का सर्वाधिक सम्पन्न प्रदेश है । पौराणिक काल से ही यहॉ कदम कदम पर प्राकृतिक एवं आध्यात्मिक तीर्थाटन है । देवभूमि का अहसास मात्र देश दुनिया के लोगों पर जादुई आकर्षण छोड़ता है, लोग यहॉ आने को आतुर रहते हैं। मगर प्रदेश का 65 प्रतिशत भू-भाग वनाच्छादित है। और उत्तराखण्ड के लिए अव्यवहारिक वन कानूनों ने प्रदेश का पर्यटन विकास रोक दिया है । उन्होंने कहा कि आज आधुनिकीकरण के नाम पर पर्यटन प्रकृतिवादी या धार्मिक न होकर भोग विलासिता का पर्यटन बनता जा रहा है । पर्यटन के नाम पर तमाम तरह के नशे परोसे जा रहे हैं । पहाड़ों पर बढ़ता अंधाधुध वाहनों का बोझ न सिर्फ पहाड़ के शांत एवं प्राकृतिक वातावरण को प्रदूषित कर रहा है बल्कि कुली, डाण्डी और घोड़ा चालकों का रोजगार भी छीन रहा है।

देवप्रयाग से आए पर्यटन संरक्षण समित के संयोजक गणेश भट्ट ने कहा कि एक तरफ सरकार पर्यटन व स्वरोजगार का शोर मचा रही है वहीं दूसरी तरफ अपनी विफलता के कारण सदियों से चल रहे चारधाम तीर्थाटन यात्रा को संचालित नहीं कर पा रही है । यह सिर्फ इसलिए कि अयोग्य सरकारें इस पर्यटन प्रदेश का महत्व समझ ही नहीं पाते। इस अवसर पर उत्तराखण्ड राज्य निर्माण आन्दोलनकारी संगठन द्वारा वन मंत्री को मसूरी में वनभूमि का सर्वे शीघ्र पूरा करने के लिए ज्ञापन दिया गया। ज्ञापन में कहा गया है कि मसूरी में वनभूमि और गैर वनभूमि का चिन्हींकरण न होने के कारण लोग अपने घरों के नक्शे पास नहीं करवा पा रहे हैं  तथा लोगों को सरकार की महत्वपूर्ण वन टाईम सेटलमेंट योजना का लाभ नही मिल पा रहा है। मसूरी वन विभाग और जिला प्रशासन जानबूझकर पिछले 15 वर्षों से सर्वे को टाले हुए है जबकि इस कार्य पर लाखों रूपए खर्च किए जा चुके हैं। मसूरी शिफनकोर्ट आवासहीन समिति के अध्यक्ष संजय टम्टा और महामंत्री राजेन्द्र सेमवाल ने भी मुख्यमत्री की घोषणा के अनुरूप पुर्नवास हेतु ज्ञापन मंत्री को सौंपा।

समारोह को समिति के अध्यक्ष कमल भण्डारी, गूंज संस्था की अध्यक्षा डा0 सोनिया आनन्द रावत,सीटू के जिलाध्यक्ष लेखराज, का0 शिव प्रसाद देवली, ट्रेड यूनियन नेता आर0 पी0 बडोनी, सभासद प्रताप पंवार, दर्शन रावत, कुलदीप रौंछेला, सीटू नेता सोबन पंवार, मजदूर नेता रणजीत चौहान आदि ने भी विचार रखे।

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