मसूरी – सुख -समृद्धि की देवी श्री लक्ष्मी, ऐसे करें पूजा पाठ।

-प्रोफ़ेसर पी.के.आर्य (भगवान शंकर आश्रम, मसूरी)।

मसूरी : बहुत से रीति रिवाजों और मान्यताओं को लेकर सभी धर्मों में कुछ न कुछ मतभेद हैं लेकिन एक बात ऐसी है जिस पर सभी राजी हैं। एक देवी ऐसी हैं, जो अपने अलग अलग स्वरूपों और मुद्राओं में सब जगह विराजित हैं। राजा हो या फ़क़ीर सभी को वे समान प्रिय हैं। जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ धन सम्पदा की अधिष्ठात्री देवी श्री लक्ष्मी की। इस दुनियावी परंपरा में जहाँ हर चीज़ कभी न कभी अपवित्र और अछूत हो जाती हो ; वहां निर्विवाद रूप से श्री लक्ष्मी सदा सर्वदा स्वीकार्य हैं। उन्हें छूने और पाने में किसी को भी कोई भी गुरेज नहीं है।इस जीवन जगत की संचालिका श्री लक्ष्मी आपका हार्दिक अभिनन्दन है ,अतिशय स्वागत है।

श्री लक्ष्मी का प्रारूप

वैदिक वाङ्गमय और विश्व संस्कृति के आदि ग्रन्थ श्ऋग्वेदश् में श्री विद्या के महत्त्व का वर्णन है। ईश स्तुतियों के एक निश्चित मंत्र समूह को श्सूक्त कहा जाता है। सूक्त का शाब्दिक अर्थ है – शोभन उक्ति विशेष! वर्तमान में ऋग्वेद संहिता के मात्र 1028 सूक्त ही उपलब्ध हैं। इन सूक्तों में दो सूक्त विशेष महिमा से युक्त हैं। ये हैं पुरुष सूक्त और श्री सूक्त। श्पुरुष सूक्तश् (10 /90) में परब्रह्म या परमात्मा के विराट स्वरुप का वर्णन करते हुए उन्हें सहस्त्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षरू सहस्रपातः कहा गया है। परमात्मा सृष्टि, लय तथा स्थिति का कर्ता है। वह अपने समस्त कार्य प्रकृति की सहायता से संपन्न करता है। इस मूल प्रकृति के कईं नाम हैं जैसे भगवती, शक्ति, देवी, ईश्वरी, और लक्ष्मी। परमात्मा की इस शक्ति की व्याख्या, प्रभाव और प्रसन्नता का हेतु श्री सूक्त है। श्री सूक्तं में श्री और लक्ष्मी को एक ही दैवीय प्रभाव के दो स्वरुप माना गया है।
शक्ति प्रतिष्ठा के सर्वाेच्च ग्रन्थ श्दुर्गा सप्तसतीश् में 700 मंत्र हैं। इसी ग्रन्थ के प्रधानिकं रहस्यश् में श्री शक्ति को महालक्ष्मी के रूप में संबोधित किया गया है। महालक्ष्मी को ही अनेक ग्रंथों में अधिष्ठात्री शक्ति माना गया है। उन्हीं से महाकाली और महासरस्वती का प्रादुर्भाव हुआ है।
 यथा – महालक्ष्मीर्महाराज सर्वसत्त्वमयीश्वरी।
निराकारा च साकारा सैव नानाभिधानभृत। (दुर्गा सप्तशती -प्राधानिक रहस्य)
अर्थात महालक्ष्मी ही सर्वसत्त्वमयी एवं सर्व तत्त्वों की अधीश्वरी हैं, वही निराकार और साकार रहते हुए विविध स्वरूपों को धारती हैं।

 श्री सूक्तं का महत्व

श्री सूक्त के 16 मन्त्रों का पारायण करने वाले व्यक्ति को कभी भी किसी भी चीज़ का अभाव नहीं रहता; ये मंत्र इस प्रकार हैं –
ओउम हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१॥
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ॥२॥
अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम् ।
श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम् ॥३॥
कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम् ।
पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥४॥
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम् ।
तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ॥५॥
आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः ।
तस्य फलानि तपसानुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥६॥
उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह ।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥७॥
क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् ।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात् ॥८॥
गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् ।
ईश्वरींग् सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥९॥
मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि ।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥१०॥
कर्दमेन प्रजाभूता मयि सम्भव कर्दम ।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम् ॥११॥
आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे ।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ॥१२॥
आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१३॥
आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम् ।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१४॥
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पूरुषानहम् ॥१५॥
यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम् ।
सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत् ॥१६॥

दीपावली और श्री लक्ष्मी

श्री महालक्ष्मी की प्रसन्नता और कृपा का सबसे बड़ा पर्व दीपावली है। कार्तिक मास की अमावस तिथि को प्रदोष काल और अर्द्धरात्रि व्यापिनी हो तो यह शुभ संयोग लक्ष्मी प्राप्ति का हेतु होता है।
कार्तिकस्यासिते पक्षे लक्ष्मीर्निदां विमुञ्चति।
स च दीपावली प्रोक्तारू सर्वकल्याणरूपिणी।
(ज्योतिर्निबंध)
धर्मसिंधुश् में भी कहा गया है –
प्रदोषे दीपदान,लक्ष्मी पूजनादि विहितं।।
यही बात श्तत्त्व चिंतामणिश् में भी उल्लेखित है –
कार्तिक कृष्ण पक्षे च प्रदोषे भूतदर्शयोरू,
नरः प्रदोष समये दीपान दद्यात मनोरमान।।
दीपावली वास्तव में पाँच पर्वों का महोत्सव है। जिसका प्रारम्भ कार्तिक कृष्ण त्रियोदशी (धन -तेरस ) से और समापन कार्तिक शुक्ल द्वितीया (भैया दूज ) को होता है। दीपावली को संध्या काल में स्नान आदि से निवृत्त होकर , नए या स्वच्छ वस्त्र धारण करके अपने घर के पूजा घर में दो दीपक प्रदीप्त करें। अपने सामने दाहिने हाथ पर सरसो के तेल का दीपक और बाएं हाथ पर गाय के घी का दीया जलाएं। दोनों में मौली यानि कलावे की खड़ी बत्ती का करें। बटी बटाई बत्तियां बाजार में मिलती हैं उन्हें काटकर छोटी छोटी बनाकर रख लें। जो दीये इस्तेमाल करें उनमें बीच में पिन हो तो अति उत्तम। शेष घर भर में 9 ,18,27,54 या 108 मिट्टी के दीपक रुई की बत्ती के प्रकाशित कर सकते हैं। एक घी का चौमुखा दीपक रातभर जलाएं ,अति शुभ है। यह सभी वास्तु दोषों को समाप्त कर सुख समृद्धि को बढ़ाता है।
सामान्यतः हम घर में बने घी को सर्वाधिक शुद्ध मानते हैं। लेकिन जब घर में दूध भैंस का आता है तो वह तो वह घी गाय का कैसे हुआ  ? हटसन एगमार्क भारत सरकार का उपक्रम है उसका घी अभी तक के सभी गौ घृत में उत्तम है। रामदेव के पतञ्जलि से भी ! संभव हो तो उसी का प्रयोग करें।
श्वेत स्फटिक का श्री यन्त्र लक्ष्मी पूजन के लिए श्रेष्ठ है। मिट्टी से निर्मित लक्ष्मी गणेश भी प्रतीक स्वरुप पूजा घर में रख सकते हैं। कमलगट्टे की माला से मंत्र का जप श्रेष्ठ है। जप के बाद माला को एकदम नीचे न रखें थोड़ी देर पहन लें फिर गंगाजल से धोकर पूजास्थान पर रख दें। हवन के लिए मखाने , केसर ,गौघृत, कमलगट्टे और सफ़ेद चन्दन की सामग्री से आहुति दें।
यज्ञ के लिए विशिष्ट मंत्र यह है –
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै स्वाहा।।
रुद्राक्ष की माला पर अनिष्ट की मुक्ति हेतु मंत्र जाप का विधान है।  इसके लिए द्वादशाक्षर मंत्र यह है –
 ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सौं जगत्प्रसूत्यै नमः।।
लाल मूंगे की माला पर श्श्रीं नमःश् जप करने से रोगों और ऋण से मुक्ति मिलती है। इस अवसर पर धन के देवता कुबेर और आरोग्य की देवी काली के भी पूजन का विधान है।
कुबेर सिद्धी का विशेष मंत्र है-

श् ऐं श्रीं ह्रीं टेम क्लीं पं ॐ यक्षाय कुबेराय।। महाकाली के  बीजमंत्र -क्रीं नमः जाप करें। तन और मन की शुद्धि से ही मंत्र जाप की सार्थकता है। जिन घरों में स्त्रियों का अनादर होता है वहां लक्ष्मी कभी स्थायी रूप से नहीं रहती।

दीपावली पूजन शुभ मुहूर्त 4 नवम्बर शुभ प्रातः 6-50 से -10
लाभ 12-10 से 13-31 अमृत 13-31 से 14-51
शुभ 16-11 से 17-32 अमृत 17-32 से 19-12 लाभ 24-11 से 25-51 शुभ 27-31 से 29-11 अमृत 29-11 से 30-51 तक।

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