मसूरी – शिक्षक हर्षपति रयाल का कालजयी प्रयास, उत्तरांचली भाषा की लिपि बनाई।

मसूरी : उत्तराखंड राज्य बने 21 वर्ष हो गये लेकिन आज तक उत्तराखंड की कोई समायोजित भाषा नहीं बन पायी। हालांकि समय समय पर विद्वानों ने प्रयास किए व लिपि बनाने का प्रयास किया लेकिन उसको देवनागरी लिपि में ही प्रस्तुत किया गया। लेकिन सेवा निवृत्त अध्यापक हर्षपति रयाल ने एक कालजयी प्रयास किया व उत्तरांचली भाषा की लिपि तैयार कर ली है। जिसमें गढवाली, कुमाउंनी व जौनसारी को शामिल किया गया है व उसकी वर्ण माला तैयार की है।
लंबे समय से किए गये अथक प्रयास का नतीजा सामने आने पर सेवा निवृत्त शिक्षक हर्षपति रयाल ने इसके बारे में जानकारी देते हुए बताया कि लंबें मंथन व प्रयोगों के बाद उत्तरांचली भाषा की वर्णमाला तैयार की गई है जिसके वर्ण हमारे देवी देवताओं और प्रकृति से लिए गये हैं। इसमें देवनागरी लिपि या अन्य किसी लिपि के वर्ण नहीं लिए गये बल्कि स्वयं तैयार किए गये हैं। उनके अनुसार यह वर्णमाला तुलनात्मक अन्य लिपियों से छोटी होने के साथ ही वर्णो की आकृति वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक मूल्यों के अनुरूप है। वहीं यह समय और श्रम मित्व्ययी है। उन्होंने बताया कि उत्तरांचली वर्ण माला का प्रत्येक वर्ण अपनी नैसर्गिक ध्वनि में ही प्रायोगिक है व सीखने की सुविधा के लिए देवनागरी वर्णों का प्रयोग प्रयोगात्मक नहीं बल्कि संकेतात्मक किया गया है। इस लिपि में उच्चारणीय सुविधा के लिए आच्दादित बोलियों के प्राकृतिक ध्वनि रूप के लिए अलग अलग बोलि प्रतिनिधि चिन्ह भी रखे गये हैं। जिससे यथार्थता और प्राकृतिकता मिलेगी। यह लिपि प्रथम व स्वप्रयागिक लिपि है इसमें अपनी प्रकृति और देवी देवताओं के प्रतीकों के रूप को वर्णो के रूप में लिया गया है तथा यह अपने मूल स्वभाव की ध्वनि के लिए होगा और ये बोलियों के लेखन में आत्म निर्भर होगी।
उत्तरांचली भाषा को मुहुर्त रूप देने वाले सेवा निवृत्त शिक्षक हर्षपति रयाल ने बताया कि उत्तराचंली वर्णमाला व लिपि बनाने के पीछे उनके सेवा के दौरान परिजनों के पत्रों में लिखे गये कुछ वर्ण ऐसे थे जिससे उन्हें प्रेरणा मिली देवनागरी से हटकर अपनी गढवाली लिपि लिखी जा सकती है। व उन्होंने उस पत्र के आधार पर लिपि बनाने का संकल्प लिया व कार्य शुरू किया। उन्होंने बताया कि सबसे पहले उन्होेंने इस बात पर मंथन किया कि वर्ण संकेंत कैसे और कहां से लिए जाय जिसमें किसी भाषा की लिपि न हो साथ ही सरल व सरस हो। उन्होंने ईश प्रेरणा को मूर्त रूप देने के लिए कलम व कागज लिया व कुछ चिन्ह बनाने शुरू कियेे तो धीरे धीरे नये वर्ण कागज पर तैरने लगे। और अ से ज्ञ तक वर्ण माला तैयार कर ली। इसके लिए अपने रिश्तेदारों व भयात का भी साथ मिला। उन्होंने बताया कि इस लिपि व वर्ण माला के सृजन में गढवाली कुमाउंनी व जौनसारी बोलियों के प्रतिनिधि रूप को लिया गया व शब्दों का विकास किया गया। उन्हांेने लिपि तैयार करने के बाद इस लिपि में कहानियां, कविता, नाटक भी लिखने शुरू किये। और अब यह सामने है। इस लिपि में सभी वर्ण नये हैं किसी भी भाषा के वर्ण नहीं लिए गये। उन्होंने कहा कि अब इसके प्रकाशन का समय आ गया है व इसके वर्णों का मुहुर्त रूप देने के लिए नया सॉफटवेयर बनाना होगा जो काफी मंहगा है ऐसे में प्रदेश सरकार या ऐसी संस्था जो उत्तराचंली भाषा को ग्राहय बनाना चाहती है मदद करनी चाहिए ताकि शीघ्र ही उत्तरांच की अपनी भाषा फलीभूत हो सके। हर्षपति रयाल का जन्म 16 जून 1945 को बुगाला गांव विकासखंड नरेंद्र नगर पटटी दोगी में लक्ष्मीदत्त रयाल के घर हुआ। उनकी प्राथमिक शिक्षा पावकी देवी विद्यालय, जूनियर हाई स्कूल गूलर व इंटर,बीए व एमए अर्थशास़्त्र ऋषिकेश पीजी कालेज से किया। व 1968 में शिक्षक प्रशिक्षण लेने के बाद प्राथमिक शिक्षक के रूप में सरकारी सेवा प्रारंभ की। साहित्य और सामाजिक उत्थान में रूचि होने के चलते उन्होंने छोटी छोटी कहानियां, कविताएं व सम सामयिक विषयों पर लेख लिखने शुरू किए। इसी दौरान पैतृक गांव का मकान टूटने पर एक पुराना पत्र मिला जिसमें कुछ ऐसे वर्ण लिखे गये थे जो कि देवनागरी से भिन्न थे और यहीं से प्रेरणा मिली व उत्तरांचली भाषा पर कार्य शुरू किया जो अब पूरा हो चुका है बस उम्मीद है कि इसे सरकार से मान्यता मिले व आने वाले समय में उत्तरांचली भाषा के रूप में इसका प्रयोग हो सके। मालूम हो कि हर्षपति के पुत्र मनोज रयाल मसूरी में महात्मा योगेश्वर सरस्वती शिशु विद्या मंदिर इंटर कालेज के प्रधानाचार्य के पद पर कार्यरत हैं।

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