पहले हमें काटो, फिर इन्हें काटना ये कहकर पेड़ों से लिपट गई थीं गौरा देवी, पढ़ें ‘चिपको’ की कहानी
‘गौरा देवी’ पहाड़ की वो महिला जिसने सैकड़ों कुल्हाड़ियों के आगे पेड़ों को गले लगाया और ‘चिपको’ आंदोलन को जन्म दिया. रिपोर्ट- धीरज सिंह सजवाण
आज 5 जून ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ है. पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, जंगलों के कटान, ग्लेशियरों के पिघलने और पर्यावरणीय आपदाओं की चिंता कर रही है, ऐसे में अब उत्तराखंड की गौरा देवी की याद आती है. गौरा देवी- जिनके लिए जंगल केवल पेड़ नहीं थे, वे पहाड़ की महिलाओं का मायका था. जब उन जंगलों पर कुल्हाड़ियां चलीं तो गौरा देवी आगे बढ़ीं और बोली-
‘ये जंगल हमारा मायका है, हम इन्हें कटने नहीं देंगे’. इसके साथ ही गौरा देवी और कई महिलाएं पेड़ों से लिपट गईं और जंगल को कटने से बचा लिया. इसी कदम का नाम पड़ा ‘चिपको आंदोलन’.
जब हक-हकूकों की लड़ाई से शुरू हुआ आंदोलन: पर्यावरणविद् राजीव नयन बहुगुणा कहते हैं, ‘चिपको आंदोलन’ की शुरुआत केवल पर्यावरण संरक्षण के नाम पर नहीं हुई थी. इसके पीछे स्थानीय लोगों के हक-हकूकों का सवाल भी था. उस दौर में अंगु (Botanical name: Fraxinus micrantha) के पेड़ बेहद मूल्यवान माने जाते थे. इनकी लकड़ी से क्रिकेट बैट तक बनाए जाते थे. लेकिन जब पेड़ों के आवंटन की बात आई तो स्थानीय सहकारी समिति को केवल 6 पेड़ दिए गए, जबकि बड़े उद्योगपतियों को लगभग 600 पेड़ों का ठेका दे दिया गया. यहीं से स्थानीय लोगों में असंतोष पैदा हुआ. यह केवल पेड़ों के लिए लड़ाई नहीं थी, बल्कि संसाधनों पर स्थानीय समुदाय के अधिकार की लड़ाई थी. धीरे-धीरे यह संघर्ष व्यापक पर्यावरणीय आंदोलन में बदल गया.
राजीव नयन बहुगुणा कहते हैं कि, बाद में आंदोलन का स्वरूप बदलता गया और यह सवाल उठने लगा कि जंगलों को केवल आर्थिक संसाधन नहीं बल्कि जीवन के आधार के रूप में देखा जाना चाहिए.
‘जंगल हमारा मायका है’: 1973 में जब रैणी गांव के पास जंगलों में पेड़ काटने के लिए मजदूर और ठेकेदार पहुंचे तो गांव के अधिकांश पुरुष वहां मौजूद नहीं थे. ऐसे समय में गौरा देवी ने गांव की महिलाओं को एकजुट किया. वे सीधे जंगल पहुंचीं और पेड़ों के सामने खड़ी हो गईं. राजीव नयन बहुगुणा बताते हैं कि,

गौरा देवी हर पहाड़ी महिला की तरह जंगलों से गहरे भावनात्मक रूप से जुड़ी हुई थीं. वह कहा करती थीं, ‘जंगल हमारा मायका है’. पहाड़ की संस्कृति में मायका केवल एक घर नहीं होता, बल्कि सुरक्षा, अपनापन और जीवन का प्रतीक होता है. महिलाओं के लिए जंगल भी कुछ ऐसा ही था. घास, लकड़ी, पानी, चारा और जीवन की अनगिनत जरूरतें जंगलों से पूरी होती थीं. इसलिए जब जंगलों पर बाहरी ताकतों का खतरा बढ़ा, तो महिलाओं ने उसे अपने अस्तित्व पर हमला माना. गौरा देवी और उनके साथियों ने पेड़ों को गले लगा लिया. उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि, ‘पहले हमें काटो, फिर इन पेड़ों को काटना’. कहा जाता है कि महिलाओं के इस अद्भुत साहस के सामने ठेकेदारों और मजदूरों को पीछे हटना पड़ा. यहीं से ‘चिपको’ इतिहास बन गया.
-राजीव नयन बहुगुणा, पर्यावरणविद्-
गौरा देवी ने बदल दी दुनिया की पर्यावरणीय सोच: ‘चिपको आंदोलन’ केवल रैणी गांव तक सीमित नहीं रहा. यह पूरे उत्तराखंड और फिर देशभर में फैल गया. राजीव नयन बहुगुणा बताते हैं कि, उस दौर में जनकवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय समुदायों ने आंदोलन को नई ऊर्जा दी. वे याद करते हैं कि लोक कवि घनश्याम रतूड़ी (सैलानी) बसों की छतों पर बैठकर गांव-गांव जाते थे और गढ़वाली बोली में गाते थे.
“खड़ उठा भाई बंधों सब कट्ठा होला,
सरकारी नीति से जंगल बचौला,
चिपको पेड़ों पर अब ना कटणा दिया,
जंगल कु संपत्ती अब ना लुटणा दिया”.
इन गीतों ने आंदोलन को जनआंदोलन में बदल दिया. धीरे-धीरे ‘चिपको’ शब्द केवल उत्तराखंड का नहीं रहा, बल्कि दुनिया भर में पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक बन गया. चिपको आंदोलन का प्रभाव केवल जंगल बचाने तक सीमित नहीं रहा. राजीव नयन बहुगुणा बताते हैं कि,
आंदोलन के बाद 1981-82 में हिमालयी क्षेत्रों में व्यावसायिक कटान पर रोक लगी. वन संरक्षण से जुड़े कानून मजबूत हुए. 1980 में वन संरक्षण अधिनियम लागू हुआ. इसके बाद पर्यावरणीय मुद्दों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चर्चा शुरू हुई. भारत सरकार को अलग से पर्यावरण मंत्रालय की स्थापना तक करनी पड़ी. एक गांव की महिला द्वारा उठाई गई आवाज ने राष्ट्रीय नीतियों को प्रभावित किया. यह अपने आप में असाधारण घटना थी.
-राजीव नयन बहुगुणा, पर्यावरणविद्-
जंगल थे महिलाओं के जीवन का हिस्सा: वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत बताते हैं कि,
आज की पीढ़ी के लिए यह समझना कठिन हो सकता है कि उस समय जंगलों का महत्व क्या था? उनके अनुसार, पहाड़ की महिलाएं दिन में कई बार जंगल जाती थीं. सुबह, दोपहर और शाम, जीवन का बड़ा हिस्सा जंगलों के साथ बीतता था. जंगल केवल संसाधन नहीं थे, बल्कि भावनात्मक संबंध का हिस्सा थे. जब सैकड़ों पेड़ों को एक साथ काटे जाने की बात सामने आई, तो लोगों ने उसे अपने जीवन पर हमला माना. इसी भावनात्मक जुड़ाव ने ‘चिपको आंदोलन’ को जन्म दिया. आज उत्तराखंड को फिर उसी चेतना की आवश्यकता है.
-जय सिंह रावत, वरिष्ठ पत्रकार-
जय सिंह रावत का कहना है कि, जिस रैणी गांव से गौरा देवी आती थीं, वही रैणी गांव आज कई आपदाओं की मार झेल चुका है. वर्षों बाद वहां जलविद्युत परियोजनाएं आईं, बड़े स्तर पर निर्माण कार्य हुए, खनन हुआ और प्रकृति के साथ छेड़छाड़ बढ़ी. गौरा देवी जिस बात को लेकर चेतावनी दे रही थीं, आज उसके परिणाम उत्तराखंड विभिन्न आपदाओं के रूप में देख रहा है. जलवायु परिवर्तन, भूस्खलन, बादल फटना और अनियोजित विकास आज पहाड़ के सामने बड़ी चुनौतियां हैं. सबसे बड़ी चिंता यह है कि लोगों और जंगलों के बीच का रिश्ता कमजोर हो गया है. सरकारें जंगलों पर अधिकार तो जताती हैं, लेकिन सामुदायिक भागीदारी के बिना संरक्षण संभव नहीं है.
गौरा देवी कोई पर्यावरण वैज्ञानिक नहीं थीं, फिर भी इतिहास रच गईं: प्रसिद्ध पर्यावरणविद् हेमंत ध्यानी कहते हैं कि, गौरा देवी की सबसे बड़ी ताकत उनकी डिग्री नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ उनका जीवंत संबंध था. वे कहते हैं कि,
गौरा देवी जैसी महिलाएं पहाड़ की पर्वतीय चेतना, संस्कार और परंपराओं की वाहक रही हैं. उन्होंने पर्यावरण संरक्षण की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली थी, लेकिन उन्होंने दुनिया को सिखा दिया कि प्रकृति की रक्षा के लिए सबसे जरूरी चीज संवेदनशीलता है.
पहाड़ की महिलाएं हमेशा से प्रकृति के सबसे करीब रही हैं. इसीलिए जब जंगलों पर संकट आया तो सबसे पहले महिलाओं ने आवाज उठाई. आज भी उत्तराखंड के कई क्षेत्रों में महिलाएं प्रकृति और संस्कृति की रक्षा के लिए पहाड़ की तरह खड़ी दिखाई देती हैं. शराब की दुकानों के खिलाफ महिलाओं के आंदोलन हों या स्थानीय संसाधनों की रक्षा की लड़ाई, उनमें वही चेतना दिखाई देती है जिसकी प्रतीक कभी गौरा देवी थीं.
-हेमंत ध्यानी, पर्यावरणविद्-
आज भी जिंदा है गौरा देवी की विरासत: आज दुनिया पर्यावरण संरक्षण के लिए बड़े-बड़े सम्मेलन कर रही है. जलवायु परिवर्तन पर अरबों रुपए खर्च किए जा रहे हैं. नई नीतियां बन रही हैं. लेकिन लगभग 50 साल पहले उत्तराखंड के एक छोटे से गांव में एक महिला ने जो संदेश दिया था, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है. गौरा देवी ने सिखाया था कि जंगल केवल लकड़ी नहीं होते. वे मिट्टी है, पानी है, हवा है और जीवन है.

शायद यही कारण है कि गौरा देवी केवल इतिहास का एक नाम नहीं बल्कि आज भी हिमालय की चेतना है. जब भी जंगलों पर संकट आएगा, जब भी प्रकृति और विकास के बीच संतुलन का सवाल उठेगा. जब भी कोई महिला अपने पर्यावरण की रक्षा के लिए खड़ी होगी, तब-तब गौरा देवी की कहानी याद की जाएगी. क्योंकि कुछ लोग इतिहास में दर्ज होते हैं और कुछ लोग इतिहास की दिशा बदल देते हैं. गौरा देवी उन लोगों में थीं जिन्होंने इतिहास की दिशा बदल दी.

