उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण से जमीअत नाखुश, मदरसों के अस्तित्व पर संकट बताया
जमीअत उलेमा-ए-हिंद ने यह भी कहा कि उत्तराखंड के नए कानून को उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा चुकी है
देहरादून: उत्तराखंड में 30 जून को मदरसा बोर्ड की समाप्ति के साथ ही 1 जुलाई से अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण की शुरुआत हो गई है. जमीअत उलेमा-ए-हिंद ने इस नई व्यवस्था पर गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई हैं. इसके प्रवक्ता ने सरकार से कानून के क्रियान्वयन पर पुनर्विचार और हाईकोर्ट के अंतिम फैसले तक किसी भी कठोर कार्रवाई को स्थगित रखने की मांग की है. जमीअत के प्रवक्ता ने मदरसों के अस्तित्व पर संकट भी बताया.
अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण पर जमीअत का सवाल: मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का शुभारंभ किए जाने के बाद इस मुद्दे पर प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया है. जमीअत उलेमा-ए-हिंद, उत्तराखंड ने प्राधिकरण से संबंधित नई व्यवस्था को लेकर आधिकारिक बयान जारी किया है. उन्होंने इसे केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक और शैक्षिक अधिकारों से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय बताया है.
संविधानिक अधिकारों के हनन की जताई आशंका: जमीअत उलेमा-ए-हिंद, उत्तराखंड ने कहा कि राज्य सरकार वर्ष 2012 में गठित उत्तराखंड मदरसा शिक्षा व्यवस्था को समाप्त कर उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के माध्यम से मदरसों के लिए नई व्यवस्था लागू कर रही है. संगठन का कहना है कि इस विषय को केवल प्रशासनिक सुधार के रूप में नहीं देखा जा सकता, क्योंकि यह सीधे तौर पर धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के शैक्षिक अधिकारों से जुड़ा हुआ है.
जारी बयान में जमीअत ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25, 26, 29 और 30 का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन, आचरण और प्रचार करने का अधिकार देता है. साथ ही धार्मिक एवं भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और संचालन का विशेष संरक्षण भी प्रदान करता है. संगठन का कहना है कि किसी भी नई व्यवस्था को लागू करते समय इन संवैधानिक प्रावधानों का सम्मान किया जाना आवश्यक है.
जमीअत ने यह भी कहा कि उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड का गठन वर्ष 2012 में हुआ था. उससे पहले भी प्रदेश के मदरसे स्वतंत्र रूप से संचालित होते रहे हैं. समाज के सहयोग से धार्मिक और नैतिक शिक्षा का कार्य लंबे समय से चलता रहा है. ऐसे में यह मानना उचित नहीं होगा कि मदरसों का अस्तित्व केवल मदरसा बोर्ड पर निर्भर रहा है. संगठन ने अपने बयान में न्यायालयों के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि पूर्णतः धार्मिक शिक्षा प्रदान करने वाले संस्थानों की प्रकृति सामान्य विद्यालयों से अलग होती है. इसलिए उन पर सामान्य शिक्षण संस्थानों की तरह सभी नियमों को समान रूप से लागू करना व्यावहारिक और न्यायसंगत नहीं माना जा सकता.
सरकार से कठोर और दंडात्मक कार्रवाई से बचने की अपील: जमीअत उलेमा-ए-हिंद ने यह भी कहा कि उत्तराखंड के नए कानून को उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा चुकी है और मामला न्यायालय में विचाराधीन है. ऐसे में अंतिम न्यायिक निर्णय आने तक सरकार को किसी भी प्रकार की कठोर अथवा दंडात्मक कार्रवाई से बचना चाहिए. संगठन ने नई व्यवस्था से संभावित परेशानियों का भी उल्लेख किया है. जमीअत के अनुसार नई व्यवस्था लागू होने पर संस्थानों को अलग-अलग विभागों से मान्यता लेने की आवश्यकता पड़ सकती है, जिससे नियमों और प्रक्रियाओं के अनुपालन में व्यावहारिक कठिनाइयां उत्पन्न होंगी. इसके अलावा मदरसों में पहले से निर्धारित धार्मिक शिक्षा की समय-सारणी प्रभावित होने की आशंका भी जताई गई है.
प्राधिकरण धार्मिक संस्थानों की स्वायत्ता को प्रभावित कर सकता है- जमीअत: मोहम्मद शाह नज़र, प्रवक्ता जमीअत उलेमा ए हिंद ने अपने बयान में कहा कि-
उत्तराखंड कि कुछ मदरसे पहले से सीबीएसई और आईसीएसई जैसे बोर्डों से संबद्ध हैं. नई व्यवस्था में ऐसे संस्थानों की स्थिति को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश सामने नहीं आए हैं. धार्मिक शिक्षा के पाठ्यक्रम और स्वरूप को लेकर प्राधिकरण की भूमिका धार्मिक संस्थानों की स्वायत्तता को प्रभावित कर सकती है.
-मोहम्मद शाह नज़र, प्रवक्ता जमीअत उलेमा ए हिंद-
