मुनस्यारी के मल्ला जोहार में बिल्जू नाला बना मुसीबत, लोग सीढ़ी के सहारे कर रहे पार, अफसर नहीं उठा रहे फोन

मुनस्यारी स्थित मल्ला जोहार (मिलम) मार्ग पर बिल्जू नाले में पक्का पुल नहीं है, इन दिनों आई बाढ़ लोगों की जान की परीक्षा ले रही

पिथौरागढ़: उत्तराखंड के लोगों के लिए मानसून सीजन हर बार कड़ी परीक्षा लेकर आता है. ये परीक्षा जान बचाने की होती है. मानसून की बारिश में जगह-जगह लैंडस्लाइड हो रहा है और बाढ़ आ रही है. ऐसे में पहाड़ के लोगों की जान आफत में है. राज्य की सीमांत और दुर्गम जिले पिथौरागढ़ से ऐसी तस्वीरें सामने आई हैं कि उन्हें देखकर एकबारगी आप कांप जाएंगे.

मल्ला जोहार में उफनता नाला बना मुसीबत: पिथौरागढ़ के मुनस्यारी स्थित मल्ला जोहार (मिलम) मार्ग पर बिल्जू नाले में पक्का पुल नहीं है. पिछले एक सप्ताह से लगातार हो रही बारिश के बाद नाला उफान पर है. हालात ऐसे हैं कि वाहन तो दूर, पैदल निकलना भी खतरे से खाली नहीं है. लोग लकड़ी के लट्ठों से अस्थायी पुल बनाकर किसी तरह नाला पार कर रहे हैं. बिल्जू नाले में पुल न होने का असर सिर्फ ग्रामीणों पर ही नहीं, बल्कि चीन सीमा पर तैनात सुरक्षा बलों के जवानों पर भी पड़ रहा है.

लट्ठों से बने अस्थाई पुल से जान जोखिम में डालकर यात्रा कर रहे लोग: सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें बच्चे जाते हुए दिखाई दे रहे हैं वाहनों की आवाजाही पूरी तरह बंद होने से जवानों को भी पैदल जोखिम उठाकर नाला पार करना पड़ रहा है. नाले में पानी बढ़ने के साथ ही बिल्जू, मिलम, बुर्फ और मरतोला जैसे उच्च हिमालयी गांवों का संपर्क प्रभावित हो गया है. माइग्रेशन पर गए ग्रामीणों के लिए भी गांव पहुंचना चुनौती बन गया है.

हर साल जोखिम में रहती है जान: यहां बारिश के दौरान हर साल यही स्थिति बनती है, लेकिन अब तक स्थायी पुल का निर्माण नहीं हो सका. स्थानीय लोगों का कहना है कि हर बरसात में यही हाल होता है. पुल न होने से बच्चों, बुजुर्गों, महिलाओं और बीमार लोगों को सबसे ज्यादा दिक्कत झेलनी पड़ती है. ग्रामीणों ने सरकार से जल्द स्थायी पुल बनाने की मांग की है, ताकि हर मानसून में जान हथेली पर रखकर रास्ता पार करने की मजबूरी खत्म हो सके. पिथौरागढ़ जिले में बारिश के कारण लगभग एक दर्जन सड़कें बंद हुई हैं.

समाज के हर वर्ग के लिए मुसीबत बनता है ये नाला: प्रदेश के पहाड़ी जिलों में आपदा के दौरान लोगों को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. लगातार बारिश, भूस्खलन और बादल फटने जैसी घटनाओं से सड़कें बंद हो जाती हैं, जिससे गांवों का संपर्क जिला मुख्यालय से टूट जाता है. कई स्थानों पर बिजली, पेयजल और संचार सेवाएं भी प्रभावित हो जाती हैं. बीमार, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों को समय पर अस्पताल पहुंचाने में भारी दिक्कत होती है. खाद्यान्न, दवाइयों और दैनिक जरूरत की वस्तुओं की आपूर्ति भी बाधित हो जाती है. किसानों की फसलें और पशुपालकों का चारा नष्ट होने से आर्थिक नुकसान बढ़ जाता है. विद्यालय बंद होने से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है. राहत और बचाव दल खराब मौसम तथा दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण कई बार समय पर प्रभावित क्षेत्रों तक नहीं पहुंच पाते.

पिथौरागढ़ में बेहतर आपदा प्रबंधन की जरूरत: विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर चेतावनी, मजबूत सड़क और संचार व्यवस्था तथा स्थानीय स्तर पर आपदा प्रबंधन की बेहतर तैयारी से इन समस्याओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है. लेकिन पिथौरागढ़ के सीमांत इलाकों में बारिश सिर्फ मौसम नहीं, मुश्किलों की परीक्षा बन जाती है. पिथौरागढ़ के मुनस्यारी और धारचूला में लोग आज भी लकड़ी के लट्ठों के सहारे उफनते नाले पार करने को मजबूर हैं. पक्का पुल नहीं होने से चीन सीमा पर तैनात जवानों से लेकर ग्रामीण तक हर दिन जान जोखिम में डालकर आवाजाही कर रहे हैं. साथ ही नाले का जलस्तर बढ़ने के कारण कई गांवों का संपर्क टूट गया है.

डीएम और आपदा प्रबंधन अधिकारी ने नहीं उठाया फोन: ईटीवी भारत संवाददाता प्रदीप महरा ने जब पिथौरागढ़ के जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी भूपेंद्र महरा को फोन लगाया तो पहले उनका फोन बिजी आया. जब घंटी गई तो उन्होंने फोन नहीं उठाया. पिथौरागढ़ के डीएम आशीष कुमार भटगाईं ने भी फोन नहीं उठाया.

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