वनाग्नि के लिए सिर्फ जलवायु परिवर्तन ही नहीं जिम्मेदार, अध्ययन ने बताई ब्रिटिश काल के वन प्रबंधन की खामियां

उत्तराखंड में इस साल वनाग्नि की 580 घटनाओं में 500.81 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ, नवीन उनियाल की रिपोर्ट

देहरादून: उत्तराखंड में इस साल के फायर सीजन में वनाग्नि की कुल 580 घटनाएं दर्ज की गईं. आग की चपेट में आने से 500.81 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है. वनाग्नि से सबसे ज्यादा नुकसान चीड़ यानी Pine के जंगलों को हुआ, जो कुल घटनाओं का करीब 56% और प्रभावित क्षेत्र का 52.36% रहा.

फॉरेस्ट फायर सीजन उत्तराखंड के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होता. इस दौरान जंगलों में भीषण आग की घटनाएं राज्य ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहती हैं. हालांकि इस दौरान इन घटनाओं के पीछे की वजहों पर काम करने की बात कही जाती है, लेकिन एक नए अध्ययन में जलवायु परिवर्तन और सूखे मौसम के अलावा कुछ और वजहों को भी वैज्ञानिक आधार पर सामने रखा है. इस दौरान ब्रिटिश कालीन वन प्रबंधन को भी इसके लिए जिम्मेदार माना गया है.

वनाग्नि के लिए सिर्फ जलवायु परिवर्तन ही नहीं जिम्मेदार: उत्तराखंड में गर्मी बढ़ते ही जंगलों में आग की घटनाएं भी बढ़ने लगती हैं. हर साल वन विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती जंगलों को आग से बचाने की होती है. आग की घटनाओं के बाद इसकी वजह तलाशने पर सबसे पहले मौसम और इंसानी लापरवाही का जिक्र होता है. तापमान बढ़ना, लंबे समय तक बारिश नहीं होना और जंगल में सूखी पत्तियों का जमा होना, इन सभी को आग के लिए अनुकूल माना जाता है.

वनाग्नि को लेकर आया ये अध्ययन: लेकिन वनाग्नि को लेकर अब एक अध्ययन ने चर्चा को थोड़ा पीछे ले जाकर देखने की कोशिश की है. सवाल ये उठाया गया है कि जिस जंगल में आज आग तेजी से फैलती है, उसकी मौजूदा बनावट आखिर तैयार कैसे हुई? इसी पहलू को लेकर ‘जब प्लांटेशन, प्लांटेशन जैसे दिखना बंद हो जाते हैं: उत्तराखंड हिमालय में आग, प्लांटेशन लॉजिक और जंगल का इस्तेमाल‘ (When Plantations Stop Looking Like Plantations: Fire, Plantation Logics, and Forest Use in the Uttarakhand Himalaya) शीर्षक से अध्ययन सामने आया है. इसमें उत्तराखंड के जंगलों को केवल मौजूदा परिस्थितियों के आधार पर नहीं देखा गया, बल्कि वन प्रबंधन के इतिहास और जंगलों के इस्तेमाल में आए बदलावों को भी समझने की कोशिश की गई है.

रिसर्च में पुराने वन प्रबंधन दस्तावेजों, सरकारी रिकॉर्ड और स्थानीय लोगों की बताई गई वन परंपराओं को आधार बनाया गया. इसके जरिए ये समझने की कोशिश की गई कि समय के साथ जंगलों की वनस्पति, जमीन पर मौजूद जैविक सामग्री और लोगों का जंगलों के साथ रिश्ता किस तरह बदला.

ब्रिटिश दौर से शुरू हुई कहानी: उत्तराखंड के जंगलों की मौजूदा स्थिति को समझने के लिए अध्ययन में ब्रिटिश काल की वन व्यवस्था को भी महत्वपूर्ण माना गया है. औपनिवेशिक शासन के दौरान जंगलों को सिर्फ स्थानीय जरूरतों से जुड़े संसाधन के तौर पर नहीं देखा गया. लकड़ी और दूसरे वन उत्पादों के व्यावसायिक इस्तेमाल को बढ़ावा मिला और जंगलों को एक तय वन प्रबंधन व्यवस्था के तहत लाने की प्रक्रिया शुरू हुई.

इस दौरान अलग-अलग इलाकों में प्लांटेशन और वन प्रबंधन की ऐसी प्रक्रियाएं अपनाई गईं, जिनसे जंगलों की संरचना पर लंबे समय तक असर पड़ा. अध्ययन में खास तौर पर चीड़ समेत अलग-अलग प्रजातियों के प्लांटेशन और उनके बाद बने वन परिदृश्य को देखा गया है.

हालांकि आज पहाड़ों में नजर आने वाला हर चीड़ का जंगल सीधे तौर पर प्लांटेशन नहीं है. कई जगह पुराने प्लांटेशन समय के साथ प्राकृतिक रूप से फैलते हुए मौजूदा वन संरचना का हिस्सा बन चुके हैं. यही वजह है कि अध्ययन में सिर्फ प्लांटेशन को देखने के बजाय प्लांटेशन लॉजिक यानी जंगल को एक खास तरीके से व्यवस्थित करने की सोच के लंबे प्रभाव पर जोर दिया गया है.

जंगल में आग सिर्फ लगती नहीं, फैलती भी है: वनाग्नि को लेकर सबसे बड़ा सवाल आम तौर पर यही होता है कि आग शुरू कहां से हुई? लेकिन अध्ययन इससे आगे की स्थिति पर ध्यान देता है. आग लगने के बाद वो जंगल में कितनी तेजी से आगे बढ़ती है, इसके लिए जंगल की बनावट भी महत्वपूर्ण है. अगर वन क्षेत्र में सूखी जैविक सामग्री ज्यादा जमा है, वनस्पति लगातार एक-दूसरे से जुड़ी हुई है और जमीन पर आग को आगे बढ़ाने वाला ईंधन मौजूद है, तो एक छोटी आग भी बड़े इलाके में फैल सकती है. यही वजह है कि अध्ययन में वनस्पति संरचना, जमीन पर जमा जैविक सामग्री और ईंधन की निरंतरता को वनाग्नि के जोखिम से जोड़कर देखा गया है. यानी आग की शुरुआत और आग के फैलाव को एक ही कारण से नहीं समझा जा सकता.

चीड़ पर पूरा दोष नहीं: उत्तराखंड में जंगल की आग की चर्चा होते ही चीड़ का नाम सबसे पहले आता है. इसकी सूखी पत्तियां यानी पिरूल गर्मियों में जमीन पर बड़ी मात्रा में जमा रहती हैं और आसानी से आग पकड़ सकती हैं. लेकिन अध्ययन का निष्कर्ष यह नहीं है कि सिर्फ चीड़ ही वनाग्नि का कारण है. मामला इससे ज्यादा व्यापक है. सवाल ये है कि जंगल की मौजूदा संरचना किस तरह बनी. जमीन पर ईंधन कितना जमा हो रहा है. वन प्रबंधन के पुराने फैसलों का आज की वनस्पति पर कितना असर बाकी है. इसलिए सिर्फ किसी एक पेड़ की प्रजाति को वनाग्नि का कारण मानने के बजाय पूरे वन परिदृश्य को देखना जरूरी है.

सिर्फ स्थानीय लोगों को जिम्मेदार मानना ठीक नहीं: अध्ययन में एक महत्वपूर्ण पहलू स्थानीय समुदायों के जंगलों से संबंध का भी है. उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में जंगल से चारा, घास, पत्तियां और जलावन जुटाना लंबे समय से ग्रामीण जीवन का हिस्सा रहा है. स्थानीय लोगों की रोजमर्रा की जरूरतें जंगल से जुड़ी रही हैं और इसी के साथ जंगल के इस्तेमाल की अपनी पारंपरिक व्यवस्थाएं भी रही हैं.

अध्ययन इस धारणा पर भी सवाल उठाता है कि क्या जंगल की आग को केवल स्थानीय लोगों की गतिविधियों का परिणाम मान लिया जाए. शोध के मुताबिक ग्रामीणों का नियमित रूप से जंगल से घास, चारा और दूसरी सामग्री निकालना कई जगह जमीन पर मौजूद ईंधन की मात्रा को कम भी करता है. यानी जंगल और इंसान का रिश्ता हमेशा नुकसान पहुंचाने वाला नहीं रहा. कई जगह स्थानीय इस्तेमाल जंगल की जमीन पर जमा होने वाली ज्वलनशील सामग्री को प्रभावित करता रहा है.

जलवायु परिवर्तन की भूमिका से इनकार नहीं: इस अध्ययन का मतलब ये भी नहीं है कि वनाग्नि में मौसम की भूमिका खत्म हो गई. तापमान बढ़ना, सूखे दिनों की संख्या बढ़ना और बारिश के पैटर्न में बदलाव, ये सभी जंगल को आग के लिए ज्यादा संवेदनशील बना सकते हैं. लेकिन सिर्फ जलवायु परिवर्तन के आधार पर वनाग्नि की पूरी कहानी समझना पर्याप्त नहीं होगा. क्योंकि एक ही तरह का गर्म और सूखा मौसम अलग-अलग जंगलों में अलग असर डाल सकता है. जिस जंगल में सूखी वनस्पति और ज्वलनशील सामग्री ज्यादा होगी, वहां आग के फैलने की आशंका भी ज्यादा हो सकती है. इसलिए मौसम को जंगल की मौजूदा संरचना से जोड़कर देखना जरूरी है.

वनाग्नि रोकने की रणनीति पर भी असर: अध्ययन की सबसे अहम बात यही है कि जंगल की आग को सिर्फ फायर सीजन की समस्या मानकर इसका समाधान नहीं किया जा सकता. आग लगने के बाद उसे बुझाने की व्यवस्था जरूरी है. निगरानी जरूरी है. फायर लाइन और संसाधनों की जरूरत भी है. लेकिन इसके साथ ये देखना भी जरूरी है कि जंगल के भीतर आग को फैलाने वाला ईंधन कितना है और उसकी स्थिति क्या है.

वन प्रबंधन में स्थानीय समुदायों की भूमिका क्या हो सकती है. जंगलों में अलग-अलग प्रजातियों का संतुलन कैसे बेहतर किया जा सकता है और पुराने वन प्रबंधन के प्रभावों को मौजूदा परिस्थितियों के हिसाब से कैसे समझा जाए, इन सवालों पर भी काम करना होगा. क्योंकि उत्तराखंड में वनाग्नि का मामला सिर्फ आज की एक चिंगारी का मामला नहीं है. इसके पीछे जंगल की मौजूदा संरचना है, मौसम है, मानव गतिविधियां हैं, स्थानीय वन उपयोग है और इसके साथ जुड़ा वन प्रबंधन का लंबा इतिहास भी है.

क्या कहते हैं सीसीएफ: कुल मिलाकर ब्रिटिश कालीन वन प्रबंधन व्यवस्था भी समय बढ़ने के साथ जंगलों में आग लगने की वजह बनी है. इसी को लेकर वन विभाग के अधिकारी कहते हैं कि-

इस अध्ययन की रिपोर्ट को अभी देखा जा रहा है. जब तक इस अध्ययन को पूरी तरह से समझा नहीं जाता, तब तक इस पर कुछ भी कहना सही नहीं होगा. जंगलों में आग लगने के पीछे केवल शुष्क मौसम और जलवायु परिवर्तन ही वजह नहीं है बल्कि दूसरे कई कारण भी मौजूद हैं.
-सुशांत पटनायक, CCF वनाग्नि-

क्या कहते हैं रिटायर्ड आईएफएस अफसर: इस मामले पर लंबे समय से वनों पर काम कर रहे रिटायर्ड वन अधिकारी एसके सिंह कहते हैं कि-

ब्रिटिश काल में वनों का प्रसार और इसका उपयोग व्यावसायिक रूप से किया जाता था. अपनी इसी जरूरत को प्राथमिकता में रखते हुए जंगलों की व्यवस्था को बनाया गया था. जबकि उस दौरान स्थानीय लोगों की जंगलों पर निर्भरता और जरूरत को देखा जाना चाहिए था. साथ ही वनों में वाइल्डलाइफ के लिए जरूरी प्रजातियों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए था.
-एसके सिंह, रिटायर्ड IFS ऑफिसर-

आज स्थिति यह आ गई है कि चीड़ के वन बांज के जंगलों के साथ ही साल के जंगलों की जगह ले रहा है, और ये स्थिति वनों के लिए वनाग्नि के लिहाज से खतरनाक हो रही है, जिसके लिए एक नई वन प्रबंधन व्यवस्था की जरूरत है.

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