कपाटोघ्टन और बंद होने के दौरान कभी बाधित नहीं हुई शंकराचार्य परंपरा।
विनय उनियाल
चमोली : प्राचीन ज्योतिरमठ के प्रबंधक और जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती के शिष्य प्रतिनिधि स्वामी रामानंद सरस्वती ने कहा कि बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने और बंद होने के दौरान ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य या उनके प्रतिनिधि के धाम पर उपस्थित होने की परंपरा कभी बाधित नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों द्वारा इस परंपरा के विषय में अनाप-शनाप और गलत टिप्पणीया करके भ्रम फैलाया जा रहा है। जोकि सरासर गलत है। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों द्वारा कहा जा रहा है कि पिछले 200 ढाई सौ वर्षों तक बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने और बंद होने के दौरान कोई भी ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य या उनके प्रतिनिधि धाम पर मौजूद नहीं रहे जो कि बिल्कुल निराधार है। रामानंद सरस्वती ने कहा कि जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाराज का शरीर शांत होने के बाद आज से 60 साल पूर्व ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी शांतानंद सरस्वती जी महाराज द्वारा बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने व बंद होने के दौरान शंकराचार्य के उपस्थित होने की परंपरा शुरू की गई थी। उनके द्वारा ही ₹11 की प्रथम अभिषेक रसीद भी कटवाई गई। तब से लेकर आज तक यह परंपरा चलती आ रही है यह परंपरा कभी बाधित नहीं रही।
रामानंद सरस्वती ने कहा कि शांतानंद सरस्वती के बाद जगद्गुरु शंकराचार्य विष्णुदेवानंद सरस्वती और वर्तमान में जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती जी द्वारा इस परंपरा को विधिवत रूप से निभाया जा रहा है। महाराज श्री का स्वास्थ्य ठीक ना रहने की वजह से वे स्वयं शंकराचार्य जी के प्रतिनिधि के रूप में प्रतिवर्ष भगवान बद्री विशाल के कपाट खुलने और बंद होने के दौरान उपस्थित रहते हैं। और कपाट खुलने के बाद प्रथम अभिषेक जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती जी महाराज के नाम से ही करवाया जाता है। उन्होंने कहा कि ज्योतिष पीठ और शंकराचार्य परंपरा को तथाकथित बयान बाजी कर बदनाम करना सरासर गलत है।
